कन्यादान हिंदू विवाह की सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है। इस रस्म में माता-पिता अपनी बेटी का हाथ वर के हाथ में सौंपते हैं, जिससे वह उसके जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करता है। इसे एक पुण्य कर्म माना जाता है, जहां माता-पिता अपनी संतान को प्रेम, सम्मान और विश्वास के साथ उसके नए जीवन की ओर अग्रसर करते हैं। यह रस्म केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि माता-पिता की निस्वार्थ भक्ति और त्याग का प्रतीक भी है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कन्यादान को सबसे बड़ा और सबसे शुभ दान माना गया है। यह रस्म केवल बेटी को विदा करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें माता-पिता यह संकल्प लेते हैं कि वे अपनी बेटी को नए जीवन में हर प्रकार का आशीर्वाद और समर्थन देंगे। कन्यादान के समय विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जिनमें वर-वधू के सुखद वैवाहिक जीवन की कामना की जाती है। यह रस्म प्रेम, सम्मान, समर्पण और आशीर्वाद का प्रतीक है, जो विवाह के पवित्र बंधन को और भी मजबूत बनाता है।
समय के साथ कन्यादान की परंपरा को देखने का नजरिया भी बदला है। पहले यह रस्म माता-पिता की जिम्मेदारी मानी जाती थी, लेकिन आधुनिक समाज में इसे बेटी को दान करने की बजाय, उसे नए जीवन के लिए सशक्त बनाने की भावना से देखा जाता है। अब माता-पिता बेटी को उसकी पसंद और सहमति के आधार पर विवाह के लिए तैयार करते हैं, जहां वह केवल एक परंपरा निभाने की बजाय अपने नए जीवन की स्वतंत्र रूप से शुरुआत करती है। कुछ स्थानों पर वर पक्ष भी कन्यादान के दौरान वचन देता है कि वह वधू को समानता, प्रेम और सम्मान के साथ जीवन भर साथ निभाएगा। इस तरह, कन्यादान की रस्म अब अधिक समानता और आदर के भाव के साथ निभाई जाने लगी है।